भज गोविन्दम्

भज गोविन्दम्

आदि शंकराचार्य विरचितम्

मूल श्लोक एवं अर्थ

॥ मूल श्लोक ॥

भज गोविंदं भज गोविंदं,
गोविंदं भज मूढ़मते।
सम्रयते सन्निहिते काले,
नहि न रक्षति दुकृन्करणे॥ ॥

अर्थ: हे मूढ़ मन! गोविंद का भजन कर, गोविंद का भजन कर। जब अंतिम समय आएगा, तब यह व्याकरण के नियम (दुकृष्णकरणे) नहीं बचेंगे।

मूढ़ जहिहि धनागमतृष्णाम्,
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपत्तम्,
वित्तं तेन विनोदाय चित्तम्॥ 2॥

अर्थ: हे मूढ़! धन के संग्रह की तृष्णा छोड़। मन में सद्बुद्धि और वैराग्य उत्पन्न कर। जो कुछ अपने कर्मों से प्राप्त हो, उसी से संतुष्ट रह।

नारीस्तनभर नाभिदेशम्,
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम्।
एतनमानसवासदि विकारम्,
मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥ 3॥

अर्थ: स्त्री के शरीर को देखकर मोह में मत पड़ना। यह तो मांस और वसा का विकार है – इस पर बार-बार मन में विचार करें।

नलिनीदलगत जलमतितरलम्,
तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तम्,
लोकं शोकहतं च समस्तम्॥ ४॥

अर्थ: कमल के पत्ते पर जल की बूँद जैसे चञ्चल है, वैसे ही यह जीवन भी अत्यन्त क्षणभंगुर है। यह सारा संसार रोग, अहंकार और शोक से ग्रस्त है।

यावद्वित्तोपार्जनसक्तः,
तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे,
वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥ ५॥

अर्थ: जब तक तू धन कमाता है, तब तक परिवार तुझसे प्रेम करता है। जब शरीर जर्जर हो जाता है, तो घर में कोई हालचाल भी नहीं पूछता।

यावत्पवनो निवसति देहे,
तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये,
भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥ ६॥

अर्थ: जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक घर में कुशल-क्षेम पूछते हैं। प्राण निकल जाने पर उसी देह से पत्नी भी डरती है।

बालस्तावत्क्रीडासक्तः,
तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः,
परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥ ७॥

अर्थ: बचपन में खेल में, यौवन में स्त्री में, वृद्धावस्था में चिन्ता में लगा रहता है — परन्तु परब्रह्म में कोई नहीं लगता।

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः,
संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं कः कुत आयातः,
तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥ ८॥

अर्थ: कौन है तेरी पत्नी? कौन है तेरा पुत्र? यह संसार अत्यन्त विचित्र है। तू किसका है? कौन है तू? कहाँ से आया है? हे भाई! इस तत्त्व पर विचार कर।

सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वम्,
निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वम्,
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥ ९॥

अर्थ: सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से मोह का नाश, मोह के नाश से स्थिर तत्त्वज्ञान, और तत्त्वज्ञान से जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है।

वयसि गते कः कामविकारः,
शुष्के नीरे कः कासारः।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः,
ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥ १०॥

अर्थ: अवस्था बीत जाने पर काम-विकार कहाँ? जल सूख जाने पर तालाब कहाँ? धन समाप्त होने पर परिवार कहाँ? और तत्त्व जान लेने पर संसार कहाँ?

मा कुरु धनजनयौवनगर्वम्,
हरति निमेषात्कालः सर्वम्।
मायामयमिदमखिलं हित्वा,
ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥ ११॥

अर्थ: धन, जन और यौवन का गर्व मत कर। काल एक पल में सब हर लेता है। यह सब माया है — इसे जानकर और त्यागकर ब्रह्मपद में प्रवेश कर।

दिनयामिन्यौ सायं प्रातः,
शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः,
तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥ १२॥

अर्थ: दिन-रात, सायं-प्रातः, शिशिर-वसन्त बार-बार आते-जाते हैं। काल खेलता है, आयु बीती जाती है — फिर भी आशा का वायु नहीं छूटता।

द्वादशमञ्जरिकाभिरशेषः,
कथितो वैयाकरणस्यैषः।
उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः,
श्रीमच्छंकरभगवच्छरणैः॥

अर्थ: इन बारह श्लोकों में श्रीमत् शंकराचार्य भगवान् ने, व्याकरण में निपुण विद्वानों को यह सम्पूर्ण उपदेश दिया।

॥ भज गोविन्दम् ॥

“भज गोविन्दं” का सार:
शंकराचार्य का यह स्तोत्र मानव को याद दिलाता है कि सांसारिक वस्तुएँ — धन, यौवन, परिवार — सब नश्वर हैं। केवल ईश्वर-भक्ति और आत्मज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।

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